संपादक- किशन कालजयी.

इस अंक के कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों के शीर्षक है-
मुनादी- जाति गिनें जरूर लेकिन इसे मिटाने के लिए...
जाति, जनगणना और लोकतंत्र
सच्चिदानंद सिन्हा- जातिगत झगड़े और हमारा भविष्य
धीरूभाई शेठ- नये राजनीतिक सिद्धांत की जरूरत
कर्मेंदु शिशिर- जाति-व्यवस्था का स्वरूप
हितेंद्र पटेल- पराजय के इस दौर में
शंकर शरण- जातियों से नाराजगी क्यों
सुरेश पंडित- जातिवार जनगणना किसलिए
पी.सी. दास- जाति और जनगणना
प्रेमपाल शर्मा- क्रीमीलेयर का लोकतंत्र
गिरीश कुमार- जाति गणना की जरूरत
योगेंद्र- जाति गणना से पहाड़ नहीं टूट जाएगा
दिलीप मंडल- सरकारी संगठनों का प्रपंच
कंवल भारती- जातिवादियों का जातिविरोध
गंगासहाय मीणा- जनगणना में जाचि का सवाल
जितेंद्र यादव- जाति गणना से डर क्यों?
और भी बहुत कुछ...
(६६ पृष्ठ, मूल्य-20 रू.
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