Monday, September 6, 2010

जाति, जनगणना और लोकतंत्र पर केंद्रित सबलोग-जून,२०१०

जाति, जनगणना और लोकतंत्र पर केंद्रित सबलोग-जून,२०१०
संपादक- किशन कालजयी.



इस अंक के कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों के शीर्षक है-

मुनादी- जाति गिनें जरूर लेकिन इसे मिटाने के लिए...


जाति, जनगणना और लोकतंत्र


सच्चिदानंद सिन्हा- जातिगत झगड़े और हमारा भविष्य

धीरूभाई शेठ- नये राजनीतिक सिद्धांत की जरूरत

कर्मेंदु शिशिर- जाति-व्यवस्था का स्वरूप

हितेंद्र पटेल- पराजय के इस दौर में

शंकर शरण- जातियों से नाराजगी क्यों

सुरेश पंडित- जातिवार जनगणना किसलिए

पी.सी. दास- जाति और जनगणना

प्रेमपाल शर्मा- क्रीमीलेयर का लोकतंत्र

गिरीश कुमार- जाति गणना की जरूरत

योगेंद्र- जाति गणना से पहाड़ नहीं टूट जाएगा

दिलीप मंडल- सरकारी संगठनों का प्रपंच

कंवल भारती- जातिवादियों का जातिविरोध

गंगासहाय मीणा- जनगणना में जाचि का सवाल

जितेंद्र यादव- जाति गणना से डर क्यों?


और भी बहुत कुछ...
(६६ पृष्ठ, मूल्य-20 रू.

No comments:

Post a Comment