Saturday, September 18, 2010

'मीडिया के छल' को अनावृत्त करता ‘सबलोग’ का अगस्त-सितंबर, 2010 अंक

“मीडिया के छल” को अनावृत्त करता ‘सबलोग’ का अगस्त-सितंबर,2010 अंक
संपादक- किशन कालजयी.





इस अंक के कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों के शीर्षक है-

लोकमत- रामनाथ शिवेंद्र- किस जनता की बात कर रहे भाई...
मुनादी- राहुल बारपुते की याद...

मीडिया के छल

विनोद शाही- चेतना का उत्पादन और मीडिया

लीलाधर मंडलोई- कुछ बातों इनसाइड लाइव

हेमंत जोशी- मीडिया शिक्षा का फैलता जाल

आनंद प्रधान- किसका मीडिया, कैसा मीडिया

धीरंजन मालवे- अखबात का सफरनामा

राकेश भारतीय- प्रति संसार का सम्मोहन

पुण्य प्रसुन वाजपेयी- लोकतंत्र में मीडिया के खतरे

रंजीत वर्मा- क्या भारतीय मीडिया स्वतंत्र है

सुरेश पंडित- बढ़ते मनोरंजन के मायने

ईश्वर दोस्त- मीडिया और लोकतंत्र की उलटबांसी

सत्येंद्र रंजन- अमेरिकी मीडिया का कच्चा चिट्ठा

शाहनवाज आलम- फ्री मीडिया के माने

जीतेंद्र गुप्ता- अभिव्यक्ति के नयो माध्यम और वैचारिक संकट

प्रमोद रंजन- आधुनिकता और हिस्सेदारी के सवाल

विनित कुमार- वर्तुअल स्पेस और टीवी विमर्श

पुरूषोत्तम नवीन- मीडिया मजदूरों की लाचारी

दिलीप- खबर और विज्ञापन का घोल

आनंद मिश्रा- मीडिया का चाल, सब बेहाल

प्रियंका श्रीवास्तव- धारावाहिकों में स्त्री

और भी बहुत कुछ...
(74 पृष्ठ, मूल्य-20 रू.)

इस संदर्भ में 12 September 2010 को 'मोहल्ला लाइव' में प्रकाशित पोस्ट 'साभार' प्रस्तुत है-
जिसका लिंक है-http://mohallalive.com/2010/09/12/about-sablog-august-issue/

सबलोग ने ताजा अंक में मीडिया को घेरा, सब पढ़ें

कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के जिन तीन खंभों की निगहबानी के लिए मीडिया ने चौथे खंभे का नाम-रूप धरा, वह चौथा खंभा अपने विस्तार के साथ ही एक अरसे से दरकने लगा है। महंगाई, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता और नक्सलवाद से तंगो-तबाह इस देश में सिर उठाती स्थानीय राष्ट्रीयताओं के बीच मीडिया बड़ी ही निश्चिंतता और निलर्ज्जता से एक ऐसे खाते-पीते समाज को प्रतिबिंबित करने में मुब्तिला है, जिसके रूमान के केंद्र में क्रिकेट और फिल्मी हस्तियों के आपसी रिश्तों के अफसाने भर पैबंद हैं। ऐसे में, “मीडिया के छल” को अनावृत्त करता ‘सबलोग’ का अगस्त-सितंबर अंक हमारे सामने है। किशन कालजयी संपादित सबलोग के इस विशेषांक में भारतीय मीडिया के साथ साथ वैश्विक मीडिया के उत्थान और पतन की कहानी दर्ज है।

विनोद शाही का ‘चेतना का उत्पादन और मीडिया’, लीलाधर मंडलोई का ‘कुछ बातें इनसाइड लाइव’, पुण्य प्रसून वाजपेयी का ‘लोकतंत्र में मीडिया के खतरे’ और हेमंत जोशी का ‘मीडिया शिक्षा का फैलता जाल’ सहित बीसेक लेख मीडिया की स्थिति को रूपायित करते हैं। सत्‍येंद्र रंजन ने ‘अमेरिकी मीडिया का कच्चा चिट्ठा’ सामने रखने की कोशिश की है तो भारतीय मीडिया और लोकतंत्र की विडंबनाओं को ईश्वर सिंह दोस्त ने ‘मीडिया और लोकतंत्र की उलटबांसी’ में रेखांकित किया है। मीडिया के सरोकार पर ‘किसका मीडिया कैसा मीडिया’ में आनंद प्रधान ने सवाल खड़े किये हैं, तो विनीत कुमार ने ‘वर्चुअल स्पेस पर टीवी विमर्श’ को व्याख्यायित किया है। सुरेश पंडित, राकेश भारतीय और रंजीत वर्मा के लेख भी संग्रह में शामिल किये गये हैं। कुल मिलाकर, मीडिया में रुचि रखने वालों और शोधार्थियों के लिए सबलोग का यह विशेषांक उपयोगी साबित होगा।

मीडिया पर केंद्रित आवरण कथा के अलावा पत्रिका के ताजा अंक में साहित्य, न्यायपालिका, खेल, स्त्री विमर्श, स्मरण और समीक्षा जैसे नियमित स्तंभ भी मौजूद हैं। ‘स्मरण’ के तहत भारतीय सिनेमा में संवेदना के पुजारी गुरुदत्त को याद किया गया है। साथ ही, ‘खेल’ में ‘खेल महायज्ञों के सफेद हाथी’ शीर्षक तले दिल्ली में आयोजित होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के घालमेल और खेलों के उद्देश्य को कठघरे में खड़ा किया गया है।

Monday, September 6, 2010

जाति, जनगणना और लोकतंत्र पर केंद्रित सबलोग-जून,२०१०

जाति, जनगणना और लोकतंत्र पर केंद्रित सबलोग-जून,२०१०
संपादक- किशन कालजयी.



इस अंक के कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों के शीर्षक है-

मुनादी- जाति गिनें जरूर लेकिन इसे मिटाने के लिए...


जाति, जनगणना और लोकतंत्र


सच्चिदानंद सिन्हा- जातिगत झगड़े और हमारा भविष्य

धीरूभाई शेठ- नये राजनीतिक सिद्धांत की जरूरत

कर्मेंदु शिशिर- जाति-व्यवस्था का स्वरूप

हितेंद्र पटेल- पराजय के इस दौर में

शंकर शरण- जातियों से नाराजगी क्यों

सुरेश पंडित- जातिवार जनगणना किसलिए

पी.सी. दास- जाति और जनगणना

प्रेमपाल शर्मा- क्रीमीलेयर का लोकतंत्र

गिरीश कुमार- जाति गणना की जरूरत

योगेंद्र- जाति गणना से पहाड़ नहीं टूट जाएगा

दिलीप मंडल- सरकारी संगठनों का प्रपंच

कंवल भारती- जातिवादियों का जातिविरोध

गंगासहाय मीणा- जनगणना में जाचि का सवाल

जितेंद्र यादव- जाति गणना से डर क्यों?


और भी बहुत कुछ...
(६६ पृष्ठ, मूल्य-20 रू.